Saturday, July 4, 2020

अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक

अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक (Sector of economy)

  • सामान्यतः संपूर्ण अर्थव्यवस्था की आर्थिक गतिविधियों को लेखांकित करने के लिए तीन क्षेत्रकों में विभाजित किया गया है-

प्राथमिक क्षेत्रक (Primary sector)

  • इसके अंतर्गत अर्थव्यवस्था के प्राकृतिक क्षेत्रों का लेखांकन किया जाता है इसके अंतर्गत निम्न क्षेत्रों को सम्मिलित किया जाता है जैसे –
  1. कृषि
  2. वानिकी
  3. मत्स्यन (मछली पकड़ना)
  4. खनन (ऊर्ध्वाधर खुदाई) एवं उत्खनन (क्षैतिक खुदाई)

द्वितीयक क्षेत्रक (Secondary sector)

  • इस क्षेत्रक के अंतर्गत मुख्यतः अर्थव्यवस्था की विनिर्मित वस्तुओं के उत्पादन का लेखांकन किया जाता है –
  1. निर्माण, जहां किसी स्थाई परिसंपत्ति का निर्माण किया जाए: जैसे -भवन- |
  2. विनिर्माण जहां किसी वस्तु का उत्पादन हो: जैसे -कपड़ा ब्रेड आदि- |
  3. विद्युत गैस एवं जल आपूर्ति इत्यादि से संबंधित कार्य |

तृत्तीय या सेवा क्षेत्रक (Third or service sector)

  • यह क्षेत्र अर्थव्यवस्था के प्राथमिक और द्वितीयक क्षेत्र को अपनी उपयोगी सेवा प्रदान करता है इसके अंतर्गत
  1. परिवहन एवं संचार
  2. बैंकिंग
  3. बीमा
  4. भंडारण
  5. व्यापार
  6. सामुदायिक सेवा आदि  
  • इसके अतिरिक्त अर्थव्यवस्था को कई अन्य आधारों पर विभाजित किया जाता है इसे निम्न प्रकार से रेखांकित किया जा सकता है –

वस्तु क्षेत्रक (Item area)

  • प्राथमिक क्षेत्रक और द्वितीयक क्षेत्रक को सम्मिलित रूप में वस्तु क्षेत्र कहा जाता है, इसके अंतर्गत भौतिक वस्तुओं के उत्पादन को शामिल किया जाता है |

गैर वस्तु क्षेत्रक (Non item area)

  • किसी अर्थव्यवस्था के सेवा क्षेत्रक को गैर वस्तु क्षेत्रक भी कहा जाता है |

संगठित क्षेत्रक (Organized sector)

  • इसके अंतर्गत वे सभी इकाइयां आ जाती है, जो अपने आर्थिक कार्यकलापों का नियमित लेखांकन करती है, भारतीय अर्थव्यवस्था में लगभग 9 प्रतिशत इस क्षेत्र से है |

असंगठित क्षेत्रक (Unorganized sector)


  • इसके अंतर्गत सभी इकाइयां आ जाती है जो अपने आर्थिक कार्यकलापों का कोई लेखा जोखा नहीं रखती है; जैसे – रेहड़ी, खोमचे, सब्जी की खुदरा दुकानें, दैनिक मजदूर आदि | भारतीय अर्थव्यवस्था में इसका योगदान लगभग 91 प्रतिशत है |

राष्ट्रीय आय की अवधारणाएं एवं प्रति व्यक्ति आय

  • सकल घरेलू उत्पाद (G.D.P.)
किसी देश की घरेलू सीमा के अंदर एक वर्ष में उत्पादित सभी वस्तुओं और सेवाओं के मौद्रिक मूल्य को सकल घरेलू उत्पादन कहते है
  • शुध्द घरेलू उत्पाद (N.D.P.)
सकल घरेलू उत्पाद में से जब उत्पादन में प्रयुक्त मशीनों और पूंजी की घिसावट को घटा दिया जाये तो शुध्द घरेलू उत्पाद प्राप्त होता है
शुध्द घरेलू उत्पाद (N.D.P.)= सकल घरेलू उत्पाद (G.D.P.)-मूल्य ह्रास
  • सकल राष्ट्रीय उत्पाद(N.D.P.)
किसी देश के द्वारा एक वर्ष में उत्पादित समस्त वस्तुओं और सेवाओं के मौद्रिक मूल्य को सकल राष्ट्रीय उत्पाद कहते है इसमें विदेशों से प्राप्त आय सम्मिलित होती है
सकल राष्ट्रीय उत्पाद (G.N.P.) = सकल घरेलू उत्पाद (G.D.P.) + विदेशों  से अर्जित विशुध्द आय
  • शुध्द राष्ट्रीय उत्पाद (N.N.P.)सकल राष्ट्रीय उत्पाद से  जब उत्पादन में प्रयुक्त मशीनों एवं पूँजी की घिसावट को घटा दिया जाता है तो शुध्द राष्ट्रीय उत्पाद प्राप्त होता है
शुध्द राष्ट्रीय उत्पाद  (N.N.P.) = सकल राष्ट्रीय उत्पाद (G.N.P.) – मूल्य ह्रास
  • राष्ट्रीय आय (N.I.)
साधन लागत पर शुध्द राष्ट्रीय उत्पाद को राष्ट्रीय आय कहते है प्रचलित कीमतों पर शुध्द राष्ट्रीय उत्पाद में से अप्रत्यक्ष कर को घटा दिया जाये और उत्पादन को जोड दिया जाये तो राष्ट्रीय आय प्राप्त होती है
राष्ट्रीय आय (N.I.) = प्रचिलित कीमतों पर शुध्द राष्ट्रीय आय – अप्रत्यक्ष कर + उपादान
  • वास्तविक राष्ट्रीय आय (R.N.I.)
किसी भी देश की मुद्रा की क्रय शक्ति में निरंतर परिवर्तन होता रहता है इसलिए वास्तविक राष्ट्र्रीय आय की जानकारी के लिए किसी आधार वर्ष के सापेक्ष शुध्द राष्ट्रीय उत्पाद की गणना की जाती है
  • प्रति व्यक्ति आय (P.C.I.)
जब कुल राष्ट्रीय आय में से कुल जनसंख्या का भाग देते है तो प्रति व्यक्ति आय प्राप्त होती है, प्रति व्यक्ति आय दो तरह से प्राप्त की जा सकती है
  • (1) प्रचलित कीमतों पर प्रति व्यक्ति आय-
प्रचलित कीमतों पर राष्ट्रीय आय /वर्तमान जनसंख्या
  • (2) स्थिर कीमतों पर प्रति व्यक्ति आय
 स्थिर कीमतों पर राष्ट्रीय आय  / वर्तमान जनसंख्या
  • वैतक्तिक आय
एक वर्ष में राष्ट्र के निवासियों को प्राप्त होने वाली वास्तविक आय वैयक्तिक आय कहलाती है
वैयक्तिक आय  = राष्ट्रीय आय + अंतरण भुगतान – निगम कर – अवतरित लाभ -सामाजिक सुरक्षा अनुदान
  • व्यय योग्य आय
प्रत्येक व्यक्ति एक वर्श में प्राप्त आय को पूर्णत: व्यय नहीं कर पाता बल्कि सरकार द्वारा प्रत्यक्ष कर के रुप में कुछ राशि ले ली जाती है शेष बची राशि को व्यय योग्य राशि कहते है
व्यय योग्य आय = वैयक्तिक आय – प्रत्यक्ष कर

भारतीय बैंकिंग व्यवस्था का इतिहास

भारतीय बैंकिंग व्यवस्था का इतिहास History of Indian Banking in Hindi


भारतीय बैंकिंग प्रणाली के विकास के इतिहास को निम्न भागों में विभाजित किया जा सकता है –

प्रथम चरण (प्रारंभ से 1806 तक)

  • ब्रिटिश शासन काल से पूर्व देश में बैंकिंग का कोई विशेष विकास नहीं हुआ था इसमें साहूकारों एवं महाजनों का वर्चस्व था
  • 18 वीं शताब्दी में ईस्ट इंडिया कंपनी ने मुंबई तथा कोलकाता में कुछ एजेंसियां गृहों की स्थापना की एजेंसी गृह आधुनिक बैंकों की भांति कार्य किया करते थे इन एजेंसी गृहों का वित्तपोषण ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारियों एवं कर्मचारियों द्वारा किया जाता था |
  • यूरोपिय बैंकिंग पद्धति पर आधारित भारत का प्रथम बैंक विदेशी पूंजी के सहयोग से एलेक्जेंडर एंड कंपनी द्वारा बैंक ऑफ हिंदुस्तान के नाम से वर्ष 1770 में कोलकाता में स्थापित किया गया किंतु यह शीघ्र ही असफल रहा |

द्वितीय चरण (1806-60)

  • वर्ष 1813 में एजेंसी गृहों के पतन के बाद निजी अंश धारियों द्वारा तीन प्रेसिडेंसी बैंकों की स्थापना की गई
  • बैंक ऑफ बंगाल 1806
  • बैंक ऑफ मुंबई 1840
  • बैंक ऑफ मद्रास 1843
  • सरकार इन तीनों बैंकों पर अपने नियंत्रण रखती थी उल्लेखनीय है कि वर्ष 1921 में तीनों बैंकों को मिलाकर इंपीरियल बैंक ऑफ इंडिया की स्थापना की गई और 1 जुलाई 1955 को राष्ट्रीयकरण के उपरांत इसका नाम बदलकर State Bank of India रख दिया गया

तृतीय चरण 1860-1973

वर्ष 1807 में संयुक्त पूंजी आंधी अधिनियम पारित किए जाने पर भारत में संयुक्त पूंजी वाले बैंकों की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हुआ इस काल में निम्नलिखित बैंकों की स्थापना हुई
  • इलाहाबाद बैंक 1865
  • एलाइंस ऑफ शिमला 1881
  • पंजाब नेशनल बैंक 1894
  • सीमित देयता के आधार पर वर्ष 1981 में स्थापित ‘अवध कमर्शियल बैंक’ भारतीयों द्वारा स्थापित संचालित पहला बैंक था पूर्ण रूप से भारतीय देश का पहला बैंक ‘पंजाब नेशनल बैंक’ था इसी अवधि में देश में तत्कालीन 4 बड़े बैंकों की स्थापना हुई
  • बैंक ऑफ इंडिया 1906
  • बैंक ऑफ़ बड़ोदरा 1908
  • सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया 1911
  • बैंक ऑफ मैसूर 1913

चतुर्थ चरण 1983-39

  • इस काल में प्रथम विश्व युद्ध 1917 यह कारण बैंकों का विकास नहीं हो सका
  • वर्ष 1921 में तीन प्रेसिडेंसी बैंकों को मिलाकर ‘इंपीरियल बैंक ऑफ इंडिया’ की स्थापना की गई

पंचम अवस्था 1939-46

  • यह अवधि बैंकिंग विस्तार की अवधि कही जा सकती है द्वितीय विश्व युद्ध के परिणाम स्वरुप उत्पन्न मुद्रा प्रसार के कारण जनसामान्य की मौद्रिक आय में वृद्धि हो गई फल अतः सभी बैंक के निक्षेप बढ़ गए |
  • युद्ध काल में बढ़ती हुई आर्थिक समृद्धि का लाभ उठाने के लिए पुराने बैंकों ने नई नई शाखाओं की स्थापना की तथा नए-नए बैंकों की भी स्थापना की गई

छठा चरण 1947 से अब तक


  • इस साल में 9 जनवरी 1949 को रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया का राष्ट्रीयकरण हुआ
  • वर्ष 1945 में भारतीय बैंकिंग का समन्वित विनियमन करने हेतु भारतीय बैंकिंग अधिनियम पारित हुआ
  • 9 जुलाई 1955 को इंपीरियल बैंक ऑफ़ इंडिया का आंशिक राष्ट्रीयकरण हुआ
  • 19 जुलाई 1969 को 14 बड़े बैंकों का राष्ट्रीयकरण हुआ
  • 15 अप्रैल 1980 को पुनः 6 बैंकों का राष्ट्रीयकरण हुआ

राष्ट्रीय आय

  1. राष्ट्रीय आय National Income in Hindi – किसी एक निश्चित वर्ष में उत्पादित अंतिम वस्तु एवं सेवाओं के कुल मौद्रिक मूल्य से राष्ट्रीय आय कहलाता है, “राष्ट्रीय आय में वस्तुओं एवं सेवाओं की बाज़ार कीमतें शामिल होती हैं”
  2. राष्ट्रीय आय के आंकणॉं से कुल उत्पादन संदृद्धि दर, राष्ट्रीय आय का ढांचा प्रति व्यक्ति राष्टीय आय, बचत एवं निवेश एवं इत्यादि के सम्बंध में जानकारी प्राप्त होती है
  3. भारत में राष्ट्रीय आय को मापने के लिये वित्त वर्ष 1 अप्रेल से 31 मार्च से माना जाता है
  4. भारत में राष्ट्रीय आय का अनुमान सर्वप्रथम दादा भाई नौरोजी ने 1868 ई0 में लगाया था, उन्होने अपनी पुस्तक “पॉवर्टी एवं अनब्रिटिश रुल इन इंडिया” में राष्ट्रीय आय की गणना की थी
  5. भारत में राष्ट्रीय आय की वैज्ञानिक गणना का श्रेय प्रो0 बी के आर वी राव को दिया जाता है, इन्होने राष्ट्रीय आय के अनुमान के लिये उत्पादन गणना प्रणाली तथा आय गणना प्रणाली के समिश्रण का प्रयोग किया, इनका अनुमान सबसे अधिक विश्वसनीय माना जाता है, इन्होने राष्ट्रीय आय का आंकलन अपनी पुस्तक “नेशनल इनकम इन ब्रिटिश इण्डिया” में प्रस्तुत किया
  6. वर्तमान समय में भारत में राष्ट्रीय आय का अनुमान केंन्द्रीय सांख्यिकी संगठन द्वारा किया जाता है, इसकी स्थापना 2 मई 1951 ई0 को की गयी थी, तथा इसका मुख्यालय नई दिल्ली में स्थित है
  7. केंन्द्रीय सांख्यिकी संगठन (C.S.O.) के वार्षिक विवरण को राष्ट्रीय लेखा सांख्यिकी कहा जाता है जिसे श्वेत पत्र भी कहा जाता है
  8. केंन्द्रीय सांख्यिकी संगठन (C.S.O.) ने राष्ट्र्रीय आय के आंकलन हेतु भारतीय अर्थव्यवस्था को तीन भागों में, (प्राथमिक, द्वितीयक तथा तृतीयक) तथा 14 उपक्षेत्रों को विभाजित किया है
  • प्राथमिक क्षेत्र – कृषि, वानिकी, मछली पालन एवं खान पान
  • द्वितीयक क्षेत्र– विनिर्माण, निर्माण, बिजली, गैस और जल आपूर्ति
  • तृतीयक क्षेत्र परिवहन, संचार, व्यापार, बैंकिंग एवं बीमा आदि सेवायें आती है
राष्ट्रीय आय को मापाने के लिये तीन विधियॉं प्रचिलित हैं
  1. उत्पादन गणना विधि
  2. आय गणना विधि
  3. उपभोग बचत विधि या व्यय विधि
  • उत्पादन गणना विधि
इसके अंतर्गत किसी देश में एक वर्ष में उत्पादित अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं का मूल्य ज्ञात किया जाता है
  • आय गणना विधि
इसके अंतर्गत अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों से प्राप्त आय का योग किया जाता है
  • व्यय विधि
इसके अनुसार राष्ट्रीय आय की गणना करने के लिये कुल उपभोग एवं कुल बचत का अनुमान लगाया जाता है इन दोनों का कुल योग ही राष्ट्रीय आय कहलाता है

भारतीय कृषि से सम्बंधित महत्वपूर्ण तथ्य

भारतीय कृषि से सम्बंधित महत्वपूर्ण तथ्य
  1. वर्तमान में भारत के GDP में कृषि क्षेत्र का 17.1% योगदान है, जबकि 1950-51 में कृषि क्षेत्र का योगदान 55.40 % था
  2. भारत में कृषि क्षेत्र का 60% भाग पूर्णत: वर्षा पर निर्भर है
  3. भारत में कृषि क्षेत्र के GDP का 0.3 % भाग कृषि शोध पर खर्च किया जाता है
  4. प्रथम कृषि गणना 1970 ई0 में की गयी थी
  5. न्यूनतम समर्थन मूल्य का निर्धारक कृषि लागत एवं मूल्य आयोग है
  6. एक हेक्टेअर से कम भूमि वाले किसान को सीमांत किसान कहा जाता है
  7. रेशम उत्पादन में चीन का प्रथम और भारत का द्वितीय स्थान है और साथ ही साथ रेशम के उपभोग में भारत का प्रथम स्थान है
  8. तम्बाकू के उत्पादन में चीन का प्रथम तथा भारत का तीसरा स्थान है, तथा तम्बाकू के उपभोग में चीन का प्रथम स्थान है
  9. भूमिगत जल के सिंचाई हेतु उपयोग को सम्भव बनाने के लिये लघु सिंचाई योजना के अंतर्गत किया जाता है
  10. भूमिहीन कृषकों एवं श्रमिकों को रोजगार उपलब्ध कराने हेतु RLEGP (Rural-Landless Employment Guarantee Programme)कार्यक्रम प्रारम्भ किया गया
  11. किसान कॉल सेंटर का उद्देश्य कृषि समबंधी सलाहकारी सेवा उपलब्ध कराना है
  12. केंद्रिय आलू अनुसंधान संसथान को 1956 ई0 में शिमला स्थानांतरित किया गया था
  13. भारत की कुल सिंचित भूमि का 36% भाग नहरों द्वारा सिंचित है
  14. भारत में कृषि क्षेत्र के 40% भाग में सिंचाई की सुविधा आसानी से उपलब्ध है
  15. 1966 में भारतीय कृषि के प्रति हेक्टेअर उत्पादकता को बढाने के लिये के उद्देशय से HYVP (Hybrid Yielding Varieties Programme)योजना चलायी गयी
  16. दालों का सर्वाधिक उत्पादन करने वाला राज्य महाराष्ट्र है
  17. भारत में कॉफी का सबसे अधिक उत्पादन कर्नाटक में होता है, जबकि विश्व में सबसे अधिक कॉफी का उत्पादन ब्राजील में होता है
  18. प्याज का सबसे अधिक उत्पादन महाराष्ट्र में होता है
  19. दूध के उत्पादन में भारत का स्थान प्रथम है
  20. दालों के उत्पादन में महाराष्ट्र का स्थान प्रथम है
  21. चाय, काजू और आम के उत्पादन में भारत का प्रथम स्थान है
  22. कृषि लागत एवं मूल्य आयोग की स्थापना 1965 में हुई थी
  23. Trifed (The Tribal Cooperative Marketing Development Federation of India Limited)की स्थापना 1987 ई0 में हुई थी
  24. भारत में हरित क्रांति की शुरुआत 1966-67 ई0 में हुई थी, तथा भारत में इसके अग्रदूत एम0 एस0 स्वामीनाथन को माना जाता है, तथा विश्व में इसका जनक “नार्मन ई0 बोरलॉग” को माना जाता है
  25. भारत में हरित कांति का सबसे अधिक प्रभाव गेंहू की फसल पर पडा, तथा सबसे निराशाजनक परिणाम दलहन की फसल में देखे गये
  26. दीर्घकालिक कृषि ऋण 5 वर्ष से अधिक मध्यकालीन की अवधि 15 माह से 5 वर्ष तक होती है, तथा अल्पकालिक ऋण की अवधि 15 माह से कम की होती है
  27. वाणिज्य बैंकों क्षेत्रिय ग्रामीण बैंकों तथा सहकारी बैंकों से प्राप्त ऋण को सरल बनाने के लिये किसान क्रेडिट कार्ड योजना 1998 से प्रारम्भ की गयी
  28. भारत के 21.2% भाग पर जंगलों का विस्तार है
  29. भारत में चंदन की लकडीयों के सबसे घने जंगल नीलगिरी की पहाडियों पर पाये जाते हैं
  30. देहरादून स्थित Forest Survey of India संस्थान द्वारा 2 वर्षों के अंतराल पर देश में वनों की स्थिति पर रिपोर्ट प्रकाशित की जाती है
  31. राष्ट्रिय किसान आयोग का गठन 2004 में किया गया, तथा इसका मुख्यालय नयी दिल्ली में है
  32. राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रबंधन संस्थान हैदराबाद में स्थित है
  33. राष्ट्रीय कृषि विपणन संसथान जयपुर में स्थित है
  34. खाद्दान्न श्रंखला क्रांति का समबन्ध खाद्दानों, फलों तथा सब्जियों को सडने से बचाने से है
  35. भारत में कृषि उत्पादन में पशुपालन की लगभग 26% हिस्सेदारी है
  36. भारत में उर्वर्कों का प्रति हेक्टेअर उपभोग कम होने का कारण कृषकों निर्धनता, अज्ञानता और अपर्याप्त जल पूर्ति है
  37. भारत नाइट्रोजनी उर्वरकों की अपनी कुल खपत का 94% हिस्सा घरेलू उत्पादन से पूरा करता है जबकि पोटेशियम उर्वरकों की पूर्ती के लिये भारत पूर्णत: आयात पर निर्भर है
  38. भारत में जोतों का औसत आकार घटने का कारण उत्तराधिकार का नियम और भू स्वामित्व की ललक है
  39. नयी राष्टीय कृषि नीति का वर्णन इंद्रधनुषिय क्रांति के रूप में किया गया है, इसमें तीन क्रांतियां सम्मिलित है हरित क्रांति, श्वेत क्रांति और खद्दान्न शृन्खला क्रांति शामिल हैं
  40. रूपांतरित राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना कृषि उत्पादन में होने वाले विभिन्न जोखिमों को ध्यान में रखते हुए कृषि मंत्रालय द्वारा किसानों को इन जोखिमों के विरुद्ध  सुरक्षा प्रदान करने के लिए वर्ष 1999-2000 के रबी मौसम से, केन्द्रीय क्षेत्रक योजना के रूप में लागू की गयी

भारत के राज्यों के उद्योग

अरुणाचल प्रदेश के उद्योग

  • अरुणाचल प्रदेश की विशाल खनिज संपदा के संरक्षण के लिए 1991 में ‘अरुणाचल प्रदेश खनिज विकास’ और ‘व्यापार निगम लिमिटेड’ (ए. पी. एम. डी. टी. सी. एल.) की स्थापना की गई थी।

आंध्र प्रदेश के उद्योग

  • हैदराबाद और विशाखापत्तनम के पास बड़े उद्योगों में मशीनी औज़ार, औषाधियाँ, भारी बिजली मशीनें, उर्वरक, इलेक्ट्रॉंनिक उपकरण, विमानों के कलपुर्जे, सीमेंट और रसायन, कांच तथा घडियों आदि का उत्पादन होता है।
    आंध्र प्रदेश में देश के अच्छे किस्म के क्रिसोलाइट एस्बेस्टस के विशालतम भंडार हैं।

ओडिशा के उद्योग

  • उद्योग प्रोत्साहन एवं निवेश निगम लि., औद्योगिक विकास निगम लिमिटेड और उड़ीसा राज्य इलेक्ट्रॉनिक्स विकास निगम ये तीन प्रमुख एजेंसियां राज्य के उद्योगों को आर्थिक सहायता प्रदान करती है।
  • इस्पात, एल्यूमीनियम, तेलशोधन, उर्वरक आदि विशाल उद्योग लग रहे हैं। राज्य सरकार लघु, ग्रामीण और कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहित करने के लिए छूट देकर वित्तीय मदद दे रही है। 2004 – 2005 वर्ष में 83,075 लघु उद्योग इकाई स्थापित की गयी।

केरल के उद्योग

  • केरल में औद्योगिक विकास की अपार संभावनाएं है। यहाँ पर पनबिजली, घने वन, दुर्लभ खनिज, परिवहन और अच्छी संचार प्रणाली, सभी बुनियादी सुविधाएं उपलब्‍ध हैं।
  • यहाँ के परंपरागत उद्योग हैं- हथकरघा, काजू, नारियल जटा तथा हस्‍तशिल्‍प। अन्‍य महत्‍वपूर्ण उद्योगों में रबड, चाय, चीनी मिट्टी के बर्तन, बिजली तथा इलेक्‍ट्रॉनिक उपकरण, टेलीफ़ोन के तार, ट्रांसफार्मर, ईंट और टाइल्स, औषधियां और रसायन, सामान्‍य इंजीनियरी वस्‍तुएं, प्‍लाईवुड, रंगरोगन, बीड़ी और सिगार, साबुन, तेल, उर्वरक तथा खादी और ग्रामोद्योग उत्‍पाद शामिल हैं।

गुजरात के उद्योग

  • गुजरात राज्य के औद्योगिक ढांचे में धीरे-धीरे विविधता आती जा रही है। यहाँ रसायन, पेट्रो-रसायन, उर्वरक, इंजीनियरिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स आदि उद्योगों का विकास रहा है।
  • 2004 के अंत में राज्य में पंजीकृत फैक्टरियों की संख्या 21,536 (अस्थाई) थी जिनमें औसतन 9.27 लाख दैनिक मज़दूरों को रोज़गार मिला हुआ था।
  • मार्च, 2005 तक राज्य में 2.99 लाख लघु औद्योगिक इकाइयों का पंजीकरण हो चुका था।

गोवा के उद्योग

  • गोवा में मत्स्य उद्योग महत्त्वपूर्ण है, सरकारी नीतियों व रियायतों ने औद्योगिक क्षेत्र के ज़रिये गोवा के तीव्र औद्योगिकीकरण को बढ़ावा दिया है। उर्वरक, रसायन, दवा, लोहा और चीनी उद्योग यहाँ के बड़े उद्योग हैं।
  • यहाँ पर मध्यम व लघु उद्योग भी हैं, जिनमें पारम्परिक हस्तशिल्प उद्योग भी शामिल हैं। औद्योगिक उत्पादों का भारत व विदेश में अच्छा बाज़ार है।

छत्तीसगढ़ के उद्योग

  • छत्तीसगढ़ में वन, खनिज और भूजल जैसे प्राकृतिक संसाधनों का असीम भंडार है। पिछले कुछ वर्षो से राज्य में उद्योगों का विस्तार हो रहा है।
  • छत्तीसगढ़ में देश का लगभग 15 प्रतिशत इस्पात तैयार होता है।
    भिलाई इस्पात संयंत्र, राष्ट्रीय खनिज विकास निगम, साउथ-ईस्टर्न कोल फील्ड्स लिमिटेड एन.टी.पी.सी. जैसे भारत सरकार और ए.सी.सी. गुजरात अंबुजा, ग्रासिम, एल एंड टी सी सी आई और फ्रांस के ला-फार्गे जैसे बड़े सीमेंट प्लांट तथा 53 इस्पात परियोजनाएं क्रियान्वयन के विभिन्न चरणों में है।

जम्मू और कश्मीर के उद्योग

  • हस्‍त‍शिल्‍प जम्मू और कश्मीर का परपंरागत उद्योग है। हाथ से बनी वस्‍तुओं की व्‍यापक रोज़गार क्षमता और विशेषज्ञता को देखते हुए राज्‍य सरकार ह‍स्‍तशिल्‍प को उच्‍च प्राथमिकता दे रही है।
  • कश्मीर के प्रमुख हस्‍तशिल्‍प उत्‍पादों में काग़ज़ की लुगदी से बनी वस्‍तुएं, लकड़ी पर नक़्क़ाशी, कालीन, शॉल और कशीदाकारी का सामान आदि शामिल हैं।
  • हस्‍तशिल्‍प उद्योग से काफ़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा अर्जित होती है। हस्‍तशिल्‍प उद्योग में 3.40 लाख कामगार लगे हुए हैं।

झारखण्ड के उद्योग

  • झारखण्ड के कुछ बडे उद्योग हैं:
  • सार्वजनिक क्षेत्र का बोकारो स्टील प्लांट,
  • जमशेदपुर में निजी क्षेत्र की टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी (टिस्को)।
  • अन्य प्रमुख उद्योग हैं: टाटा इंजीनियरिंग एंड लोकोमोटिव कंपनी (टेल्को),
  • टिमकेन इंडिया लिमिटेड (जमशेदपुर),
  • भारत कुकिंग लिमिटेड (धनबाद),

तमिलनाडु के उद्योग

  • तमिलनाडु राज्‍य के प्रमुख उद्योग हैं – सूती कपडा, भारी वाणिज्यिक वाहन, ऑटो कलपुर्जे, रेल के डिब्‍बे, विद्युतचालित पंप, चमडा उद्योग, सीमेंट, चीनी, काग़ज़, ऑटोमोबाइल और माचिस।
  • तमिलनाडु के औद्योगिक परिदृश्‍य में सूचना प्रौद्योगिकी और जैव प्रौद्योगिकी जैसे ज्ञान आधारित उद्योगों को विशेष महत्‍व दिया गया है।
  • सॉफ्टवेयर टेक्‍नोलॉजी पार्क, टाइडैल की स्‍थापना थारामणि, चेन्नई में की गई है।

नागालैंड के उद्योग

  • नागालैंड राज्‍य में औद्योगिकरण की प्रक्रिया शैशवावस्‍था में है।
    दीमापुर में एक लाख ईंटें प्रतिदिन उत्‍पादित करने की क्षमता वाली ‘नागालैंड मैकेनाइज्‍ड ब्रिक्‍स कंपनी लि.’ प्रारम्भ कर दी गई है।
  • हथकरघा और हस्‍तशिल्‍प महत्‍वपूर्ण कुटीर उद्योग है, जो अधिकतर सहकारी समितियों द्वारा चलाए जा रहे हैं।

पश्चिम बंगाल के उद्योग

  • पश्चिम बंगाल में वर्ष 2007 में, उपलब्‍ध आंकड़ों के अनुसार 3677.51 करोड़ रुपए की निवेश वाली 96 परियोजनाएं शुरू की गईं।
  • इसके अतिरिक्त हलदिया पेट्रो केमिकल्‍स की 34 अधोगामी परियोजनाओं में 160.15 करोड़ रु. का निवेश किया गया है और इस प्रकार कुल निवेश 3837.66 करोड़ रु. हो गया है।
  • यह अपेक्षित है कि 150 यूनिट की कुल संख्‍या के साथ 4014.84 करोड़ रु. का कुल निवेश 2007 के अंत तक राज्‍य में कार्यान्वित किया जाएगा और कार्यान्वित परियोजनाओं की पूरी जानकारी उपलब्‍ध होगी।

मणिपुर के उद्योग

  • मणिपुर में कृषि के बाद सबसे अधिक रोज़गार देने वाला कुटीर उद्योग हथकरघा उद्योग है।
  • यह उद्योग आय का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत है विशेषकर महिला बुनकरों के लिए यह आदर्श है। हरथकरघा बुनाई का पारंपरिक कौशल महिलाओं के लिए प्रतिष्‍ठा का प्रतीक है।
  • यह उनके सामाजिक और आर्थिक जीवन का एक अविभाज्‍य अंग है।

दिल्ली के उद्योग

  • दिल्ली न केवल उत्तर भारत का सबसे बड़ा व्‍यावसायिक केंद्र है, बल्कि यह लघु उद्योगों का भी सबसे बड़ा केंद्र है।
  • इनमें टेलीविज़न, टेपरिकार्डर, हल्‍का इंजीनियरिंग साज-सामान, मशीनें, मोटरगाडियों के हिस्‍से पुर्ज़े, खेलकूद का सामान, साइकिलें, पी.वी.सी. से बनी वस्‍तुएं जूते-चप्‍पल, कपड़ा, उर्वरक, दवाएं, हौजरी का सामान, चमड़े की वस्‍तुएं, सॉफ्टवेयर आदि विभिन्‍न वस्‍तुएं बनाई जाती हैं।

मध्य प्रदेश के उद्योग

  • मध्य प्रदेश ने इलेक्‍ट्रॉनिक्‍स, दूरसंचार, मोटरवाहनों, सूचना प्रौद्योगिकी आदि उच्‍च तकनीकी उद्योगों के क्षेत्र में प्रवेश कर लिया है। दूरसंचार प्रणालियों के लिए यह राज्‍य ऑप्टिकल फाइबर का उत्‍पादन कर रहा है।
  • इंदौर के पास पीठमपुर में बडी संख्‍या में मोटर वाहन उद्योग स्‍थापित हुए है। राज्‍य में सार्वजनिक क्षेत्र के प्रमुख उद्योग है – भोपाल में ‘भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्‍स लि.’, होशंगाबाद में ‘सिक्‍योरिटी पेपर मिल’, देवास में नोट छापने की प्रेस, नेपानगर में अख़बारी काग़ज़ की मिल और नीमच की अल्‍कालॉयड फैक्‍ट्री।

महाराष्ट्र के उद्योग

  • महाराष्ट्र को पूरे देश का औद्योगिक क्षमता का केंद्र माना जाता है और राज्‍य की राजधानी मुंबई देश की वित्‍तीय तथा वाणिज्यिक गतिविधियों का केंद्र है। राज्‍य की अर्थव्‍यवस्‍था में औद्योगिक क्षेत्र का महत्‍वपूर्ण स्‍थान है।

मिज़ोरम के उद्योग

  • संपूर्ण मिज़ोरम अधिसूचित पिछडा क्षेत्र है और इसे ‘उद्योग विहीन क्षेत्र’ के तहत वर्गीकृत किया गया है। 1989 में मिज़ोरम सरकार की औद्योगिक नीति की घोषणा के बाद पिछले दशक में यहाँ कुछ आधुनिक लघु उद्योगों की स्‍थापना हुई है।
  • मिज़ोरम ने उद्योगों का और तेजी से विकास करने के लिए वर्ष 2000 में नई औद्योगिक नीति की घोषणा की। इसमें इलेक्‍ट्रॉनिक तथा सूचना प्रौद्योगिकी, बांस तथा इमारती लकडी पर आधारित उत्‍पाद, खाद्य तथा फलों का प्रसंस्‍करण, वस्‍त्र, हथकरघा तथा हस्‍तशिल्‍प जैसे लघु और कुटीर उद्योग शामिल हैं।

मेघालय के उद्योग

  • मेघालय राज्‍य की वित्तीय एवं औद्योगिक विकास संस्‍था का नाम ‘मेघालय औद्योगिक विकास निगम लिमिटेड’ है, जो उद्योग के लिए स्थानीय उद्यमियों को वित्तीय सहायता देती है।

राजस्थान के उद्योग

  • राजस्थान सांस्कृतिक रूप में समृद्ध होने के साथ-साथ खनिजों के मामले में भी समृद्ध रहा है और अब वह देश के औद्योगिक परिदृश्य में भी तेजी से उभर रहा है।
  • राज्य के प्रमुख केंद्रीय प्रतिष्ठानों में देबरी (उदयपुर) में जस्ता गलाने का संयंत्र, खेतडी (झुंझनूं) में तांबा परियोजना और कोटा में सूक्ष्म उपकरणों का कारख़ाना शामिल है।
  • मार्च, 2006 तक राज्य में लघु उद्योगों की 2,75,400 इकाइयां थी। जिनमें 4,336.70 करोड़ रुपये की पूँजी लगी थी और लगभग 10.55 लाख लोगों को रोज़गार मिला हुआ था।

सिक्किम के उद्योग

  • सिक्किम औद्योगिक रूप से पिछड़ा राज्य घोषित किया गया है, किन्तु कई सदियों पहले यहाँ दस्तकारी पर आधारित परंपरागत सिक्किम कुटीर उद्योग हैं।
  • लेपचा लोग बांस के सामान, लकड़ी के सामान, धागा बुनाई और ग़लीचे की बुनाई परंपरागत तरीकों से बहुत ही कुशलता से करते हैं, भूटिया जाति के लोगों को गलीचा और कंबल बुनाई की प्राचीन तिब्बती पद्धति में महारत हासिल हैं और नेपाली लोग धातु, चांदी और लकड़ी के सामान की कारीगरी में बहुत ही निपुण होते हैं।

हरियाणा के उद्योग

  • हरियाणा का औद्योगिक क्षेत्र बहुत ही विस्तृत और विशाल है। राज्य में 1,343 बड़ी और 80,000 लघु उद्योग इकाइयां कार्यरत हैं। हरियाणा में बहुत सी वस्तुओं का उत्पादन होता है।
  • कार, ट्रैक्टर, मोटरसाइकिल, साइकिल, रेफ्रिजरेटर, वैज्ञानिक उपकरण आदि अनेक प्रकार के उत्पादकों का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य हरियाणा है। विश्व बाज़ार में बासमती चावल का सबसे बड़ा निर्यातक हरियाणा है।
  • पंचरंगा अचार के अतिरिक्त पानीपत में हथकरघे से बनी वस्तुएं और कालीन विश्व भर में प्रसिद्ध है और इनका निर्यात बड़े स्तर पर किया जाता है।

उत्तर प्रदेश के उद्योग

  • उत्तर प्रदेश राज्य में काफ़ी समय से मौजूद वस्त्र उद्योग व चीनी प्रसंस्करण उद्योग में राज्य के कुल मिलकर्मियों का लगभग एक-तिहाई हिस्सा लगा है। राज्य की अधिकांश मिलें पुरानी व अक्षम हैं।
  • अन्य संसाधन आधारित उद्योगों में वनस्पति तेल, जूट व सीमेंट उद्योग शामिल हैं। केन्द्र सरकार ने यहाँ पर भारी उपकरण, मशीनें, इस्पात, वायुयान, टेलीफ़ोन, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और उर्वरकों के उत्पादन वाले बहुत से बड़े कारख़ाने स्थापित किए हैं।

त्रिपुरा के उद्योग

  • त्रिपुरा में मुख्यतः छोटे पैमाने पर निर्माण कार्य होता है, जिसमें बुनाई, बढ़ईगिरि, टोकरी व मिट्टी के बर्तन बनाने जैसे कई कुटीर उद्योग शामिल हैं।
    छोटे पैमाने के उद्योगों के विकास को बढ़ाने में राज्य सरकार सक्रिय है।
    बाँस व बेंत हस्तशिल्प में कक्ष विभाजक, फ़र्नीचर भित्तिपट्टिका, टेबल मैट और फ़र्श पर बिछाने वाली चटाईयाँ शामिल हैं, जिन्हें स्थानीय स्तर पर बनाया जाता है।
  • औद्योगिक इकाईयाँ चाय, चीनी डिब्बाबंद फल कृषि औज़ार ईंट और जूते-चप्पल बनाती हैं

पंजाब के उद्योग


  • पंजाब में विभिन्न लघु व मध्यम आकार के उद्योग हैं। भारत के मुख्य राज्यों में से पंजाब में प्रति व्यक्ति आय सबसे अधिक है।
  • यहाँ सूती,,ऊनी और रेशमी वस्त्र उद्योग, खाद्य उत्पाद, धातु उत्पादन, परिवहन उपकरण व पुर्जे, धातु व मिश्र धातु उद्योगों में सबसे ज़्यादा श्रमिक कार्यरत हैं।

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