Saturday, July 4, 2020

कृषि क्षेत्र में अनुसंधान एवं विकास (हरित क्रांति)

कृषि क्षेत्र में अनुसंधान एवं विकास (R & D in agriculture sector)


हरित क्रांति (Green revolution)

  • अमेरिकी वैज्ञानिक डॉक्टर विलियम गैड में अधिक उपज देने वाली किस्मों के संदर्भ में सर्वप्रथम 1968 में हरित क्रांति शब्द का प्रयोग किया था |
  • भारत में तृतीय पंचवर्षीय योजना (1961-66) के अंतिम 2 वर्षों में देशव्यापी सूखे का प्रभाव कृषि के उत्पादन पर पड़ा अतः देश के खाद उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य को ध्यान में रखकर (1966-67) में योजना अवकाश में कृषि क्षेत्र में विकास के लिए नई कृषि रणनीति अपनाई गई |
  • इसके तहत बड़े पैमाने पर अधिक उपज देने वाले उन्नत किस्म के बीजों का प्रयोग आरंभ हुआ इस उन्नत किस्म के बीज से अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग को बढ़ावा दिया गया तथा सघन कृषि कार्यक्रम अपनाया गया |
  • इसके अलावा कृषि क्षेत्र में अनुसंधान एवं प्रशिक्षण लघु सिंचाई भूमि संरक्षण जैसे उपाय भी अपनाए गए तथा इन उपायों के परिणाम स्वरुप भारत के पश्चिमोत्तर भाग में गेहूं का उत्पादन में तीव्र वृद्धि हुई तथा अन्य फसलों के उत्पादन का भी मार्ग प्रशस्त हुआ |
  • इसे ही भारतीय कृषि के क्षेत्र में हरित क्रांति का नाम दिया गया क्योंकि इस नीति के परिणाम स्वरुप भारतीय कृषि में क्रांतिकारी परिवर्तन आया इस कार्य में अमेरिकी कृषि वैज्ञानिक डॉ नॉर्मन बोरलॉग तथा भारतीय कृषि वैज्ञानिक डॉ एम एस स्वामीनाथन का विशेष योगदान रहा |
  • भारत में हरित क्रांति के परिणामस्वरुप गेहूं, मक्का और चावल जैसे खद्यान्नों के उत्पादन में भारी वृद्धि हुई इससे भारत खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर हो गया |
  • अनाजों के आयात बंद होने से महत्वपूर्ण विदेशी मुद्रा की बचत होने लगी ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार में वृद्धि के साथ-साथ कृषि आधारित उद्योगों को भी बढ़ावा मिला |
  • इस क्रांति का लाभ देश के कुछ क्षेत्रों (पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, राजस्थान का गंगानगर जिला, महाराष्ट्र, तमिलनाडु) को प्राप्त हो तथा अन्य राज्य से अप्रभावित ही रहे इससे क्षेत्रीय असंतुलन को बढ़ावा मिला |
  • हरित क्रांति का सर्वाधिक प्रभाव गेहूँ के उत्पादन पर पड़ा शेष फसलों को हरित क्रांति का लाभ उस अनुपात में प्राप्त नहीं हो सका |
  • रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों को अत्यधिक प्रयोग से पर्यावरण प्रदूषण को भी बढ़ावा मिला 1990 के दशक तक आते-आते कृषि क्षेत्र में स्थिरता आ गई |

द्वितीय हरित क्रांति (Second Green Revolution)


  • कृषि क्षेत्र में आई इस स्थिरता को दूर करने क्षेत्रीय असंतुलन को कम करने पर्यावरण के हितों को ध्यान में रखते हुए कृषि क्षेत्र में समग्र विकास को बढ़ावा देने के उद्देश्य से सबसे पहले वर्ष 2006 के विज्ञान कांग्रेस में एपीजे अब्दुल कलाम ने द्वितीय हरित क्रांति का आह्वान किया |
  • इसके तहत उन्नत बीजों का चयन क्षेत्रीय भूमि की दशा के आधार पर किया जाएगा इसमें मोटे अनाजों के उत्पादन पर भी ध्यान दिया जाएगा |
  • द्वितीय हरित क्रांति के तहत जैव प्रौद्योगिकी तथा अनुवांशिक इंजीनियरिंग के प्रयोग द्वारा अधिक उत्पादकता एवं गुणवत्ता पूर्ण बीजों के विकास पर जोर दिया जाएगा |
  • इस चरण में ड्रिप सिंचाई एवं स्पीक स्प्रिंकलर सिंचाई जैसे सिंचाई के उन्नत एवं पर्यावरण की दृष्टि से अनुकूल साधनों के उपयोग पर बल दिया गया है |
  • इसके साथ ही वाटर शेड में मैनेजमेंट द्वारा बंजर भूमि को कृषि योग्य बनाने के उपाय किए जाएंगे |
  • प्रथम हरित क्रांति जहां उत्पादकता में वृद्धि पर आधारित थी वही द्वितीय हरित क्रांति कृषिगत आय वृद्धि पर आधारित है |

पूंजी निर्माण, पूंजी उत्पादन अनुपात

पूंजी निर्माण (capital formation)

  • वह प्रक्रिया जिससे बचत व निवेश के द्वारा पूंजी स्टॉक में वृद्धि होती है, पूंजी निर्माण कहलाती है, आधुनिक आर्थिक विकास का मूल आधार पूंजी है |
  • भारतीय योजना आयोग के अनुसार “किसी भी देश का आर्थिक विकास पूंजी की उपलब्धता पर ही निर्भर करता है आय एवं रोजगार के अवसरों की वृद्धि तथा उत्पादन की कुंजी पूंजी के अधिकाधिक निर्माण में निहित है” यदि किसी देश में पूंजी निर्माण नहीं होता है, तो वह देश अपना आर्थिक विकास नहीं कर सकता है |
  • इस प्रकार यदि पूंजी निर्माण धीमी गति से होता है, तो आर्थिक विकास भी धीमी गति से होता है |पूंजी निर्माण से अर्थ, बचत करने एवं उस बचत को उद्योगों में विनियोजित करने से हैं |
  • पूंजी निर्माण की तीन आवश्यकताएं आवश्यक दशाएं होती हैं यथा बचत, बचत के गतिशील हेतु वित्तीय संस्थाएं और विनियोग पूंजी उल्लेखनीय है कि विनियोग ऐसा वह है जो उत्पादन क्षमता में वृद्धि लाता है |

पूंजी उत्पादन अनुपात (Capital output ratio)

  • उत्पादन अनुपात से अर्थ है, कि उत्पादन की एक इकाई के लिए पूंजी की कितनी इकाइयों की आवश्यकता है इतनी को दूसरे शब्दों में इस प्रकार भी कह सकते हैं कि उपलब्ध पूंजी का निवेश करने पर उत्पादन में किस दर से वृद्धि होती है –
  • यदि ₹5000 की पूंजी विनियोजित करने पर उत्पादन ₹1000 के बराबर होता है तो पूँजी उत्पादन अनुपात 5:00 अनुपात एक कहलायेगा |

पूंजी उत्पाद अनुपात=कुल पूंजी/ कुल उत्पादन

  • जिस देश में यह अनुपात जितना कम होगा वह देश उतना ही अधिक आर्थिक विकास कर सकेगा |
  • पूंजी उत्पाद अनुपात के दो प्रकार होते हैं
  1. औसत पूंजी उत्पाद अनुपात
  2. वृद्धिमान पूंजी उत्पाद अनुपात

  • प्रथम पूंजी की कुल मात्रा एवं कुल उत्पाद के बीच अनुपात को प्रदर्शित करता है, जबकि वृद्धिमान पूंजी उत्पाद अनुपात पूंजी तथा उत्पाद की मात्रा में वृद्धि के बीच उपस्थित अनुपात को प्रदर्शित करता है |
  • उल्लेखनीय है कि चिरस्थाई उपभोक्ता वस्तुओं में अधिक निवेश ICOR को कम करता है, परंतु कृषि लघु उद्योगों और गैर स्थाई उपभोक्ता वस्तुओं में निवेश ICOR को कम करता है इसके अतिरिक्त निवेश के प्रयोग की कुशलता भी ICOR को प्रभावित करती है |

आर्थिक संवृद्धि और आर्थिक विकास

आर्थिक संवृद्धि (Economic growth)

  • आर्थिक समृद्धि से अभिप्राय निश्चित समय अवधि में किसी अर्थव्यवस्था में होने वाली वास्तविक आय में वृद्धि से है |
  • सामान्यतः यदि सकल राष्ट्रीय उत्पाद, सकल घरेलू उत्पाद तथा प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि होती है तो हम कह सकते हैं कि आर्थिक समृद्धि हो रही है |
  • 70 के दशक में आर्थिक समृद्धि को तथा आर्थिक विकास को एक ही माना जाता था, लेकिन अब इसमें अंतर किया जाता है |
  • अब आर्थिक समृद्धि आर्थिक विकास के एक भाग के रूप में देखी जाती है साधन लागत पर व्यक्त वास्तविक घरेलू उत्पाद राष्ट्रीय उत्पाद तथा प्रति व्यक्ति आय को हम सामान्यतः आर्थिक समृद्धि की आय के रूप में स्वीकार करते हैं |

आर्थिक विकास (Economic Development)

  • आर्थिक विकास से तात्पर्य उस प्रक्रिया से है, जिसके परिणाम स्वरुप देश के समस्त उत्पादन साधनों का कुशलतापूर्वक विदोहन होता है |
  • इसमें राष्ट्रीय आय और प्रति व्यक्ति आय में निरंतर एवं दीर्घकालिक वृद्धि होती है तथा जनता के जीवन स्तर एवं सामान्य कल्याण का सूचकांक बढ़ता है अर्थात इस में आर्थिक एवं गैर आर्थिक दोनों चरों को शामिल किया जाता है |
  • आर्थिक चरणों में उपरोक्त वर्णित शामिल होते हैं तथा गैर आर्थिक आर्थिक चरों के अंतर्गत सामाजिक एवं सांस्कृतिक स्त्रोतों के गुणात्मक परिवर्तन शामिल होते हैं |
  • इस प्रकार आर्थिक संवृद्धि एक मात्रात्मक संकल्पना है, जबकि आर्थिक विकास एक गुणात्मक |
  • पहले का संबंध राष्ट्रीय आय एवं प्रति व्यक्ति आय की वृद्धि दर से जुड़ा है, जबकि दूसरे का संबंध राष्ट्रीय आय में मात्रात्मक वृद्धि के अलावा अर्थव्यवस्था के संरचनात्मक ढांचे में परिवर्तन से होता है |
  • अतः कहा जा सकता है कि आर्थिक विकास एक व्यापक संकल्पना या प्रक्रिया है जिस में सकल राष्ट्रीय उत्पाद में कृषि का हिस्सा लगातार गिरता जाता है |
  • जबकि उद्योगों, सेवाओं, व्यापार, बैंकिंग व निर्माण गतिविधियों का स्तर बढ़ता जाता है इस प्रक्रिया के दौरान श्रम शक्ति के व्यावसायिक ढांचे में भी परिवर्तन होता है और उसकी दक्षता एवं उत्पादन में भी वृद्धि होती है |

आर्थिक संवृद्धि बनाम आर्थिक विकास (Economic growth versus economic development)

  • आर्थिक समृद्धि और आर्थिक विकास समान प्रतीत होने वाली अवधारणाएं है, परंतु तकनीकी दृष्टि से दोनों समान नहीं है, आर्थिक समृद्धि को दो रूपों में परिभाषित किया जा सकता है –
  1. सकल घरेलू उत्पाद में एक निश्चित अवधि में वास्तविक वृद्धि |
  2. एक निश्चित अवधि में प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि |
  • वास्तव में, आर्थिक समृद्धि से आशय सकल घरेलू उत्पाद, (GDP) सकल राष्ट्रीय उत्पाद एवम प्रति व्यक्ति आय में निरंतर होने वाली वृद्धि से है| अर्थात आर्थिक समृद्धि उत्पादन की वृद्धि से संबंधित है |
  • आर्थिक समृद्धि में देखा जाता है कि राष्ट्रीय उत्पादन में सतत वृद्धि हो रही है अथवा नहीं| यदि राष्ट्रीय उत्पादन में लगातार वृद्धि हो रही है, तो इसे संवृद्धि की संज्ञा दी जाएगी |
  • आर्थिक संवृद्धि से पता चलता है, कि अर्थव्यवस्था के विभिन्न स्त्रोतों में मात्रात्मक रूप से कितनी वृद्धि हो रही है |
  • आर्थिक विकास का संबंध लोगों के कल्याण से है, इसमें गरीबी बेरोजगारी तथा असमानता के में कमी आती है, आर्थिक संवृद्धि आर्थिक विकास की पूर्व शर्त है |

आर्थिक विकास दर (Economic growth rate)

  • सकल घरेलू उत्पादन में परिवर्तन की दर आर्थिक विकास दर कहलाती है

आर्थिक विकास दर = गत वर्ष की तुलना में वर्तमान वर्ष के जीडीपी में परिवर्तन (वृद्धि या कमी) / गत वर्ष का जीडीपी X 100


आर्थिक संवृद्धि दर (Economic growth rate)

  • निबल राष्ट्रीय उत्पाद में परिवर्तन की दर ‘आर्थिक संवृद्धि दर’ कहलाती है इसको राष्ट्रीय आय की वृद्धि दर भी कहा जाता है |

आर्थिक संवृद्धि दर = गत वर्ष की तुलना में वर्तमान वर्ष के एनएनपी में परिवर्तन वृद्धि या कमी / गत वर्ष का एनएनपी X 100

  • भारत जैसे विकासशील देशों में आर्थिक संवृद्धि दर, आर्थिक विकास दर की तुलना में कम होती है |

आर्थिक विकास को प्रभावित करने वाले कारक (Factors Affecting Economic Growth)

आर्थिक विकास को निर्धारित करने वाले कारकों को दो भागों में बांटा गया है –

आर्थिक घटक

  • प्राकृतिक संसाधन
  • पूंजी उत्पादन अनुपात
  • संगठन
  • श्रम शक्ति एवं जनसंख्या
  • तकनीकी प्रगति
  • वित्तीय स्थिरता
  • पूंजी निर्माण
  • आधारभूत संरचना
  • विकासात्मक नियोजन

गैर आर्थिक घटक


  • सामाजिक घटक
  • राजनीतिक घटक
  • धार्मिक घटक

सार्वजनिक वितरण प्रणाली

सार्वजनिक वितरण प्रणाली (Public distribution system)

  • कुछ आवश्यक वस्तुओं (गेहूं, चावल, खाद्य तेल, चीनी आदि) को उचित कीमत की दुकानों के माध्यम से उपभोक्ताओं में वितरण करने वाली प्रणाली को सार्वजनिक वितरण प्रणाली कहा जाता है |
  • इस प्रणाली का मुख्य उद्देश्य उपभोक्ताओं विशेषकर कमजोर वर्ग के उपभोक्ताओं को सस्ती दर पर वस्तुएं उपलब्ध कराना है इससे कमजोर वर्ग के उपभोक्ताओं को कीमतों के उतार-चढ़ाव पर सुरक्षा मिलती है |
  • इनके अलावा इस प्रणाली का उद्देश्य देश के विशाल जनसंख्या के न्यूनतम पोषण स्तर को कायम रखना है |
  • सार्वजनिक वितरण प्रणाली को और अधिक प्रभावी बनाने के उद्देश्य से वर्ष 1997 में लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (TPDS) की शुरुआत की गई |
  • इसमें मूल्य निर्धारण के लिए जनसंख्या को दो भागों में बांटने की नीति अपनाई गई है – गरीबी रेखा से नीचे BPL गरीबी रेखा से ऊपर (APL)|
  • इस प्रणाली के अंतर्गत गरीबी रेखा से नीचे वाले लोगों को विशेष कार्ड जारी करने तथा घटाए गए मूल्यों पर खदान की आपूर्ति की नीति अपनाई गई है |

सार्वजनिक वितरण प्रणाली तथा वाधवा कमेटी (Public Distribution System and Wadhwa Committee)


  • सर्वोच्च न्यायालय ने पूरे देश में सार्वजनिक वितरण प्रणाली की कार्यप्रणाली की समीक्षा के लिए सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार अवकाश प्राप्त न्यायाधीश डी पी वाधवा की अध्यक्षता में एक कमेटी गठित की जिसने अपनी रिपोर्ट अप्रैल 2010 में सौंपी |
  • कमेटी ने पी डी एस प्रणाली की एक अत्यंत ही चौंका देने वाली तस्वीर सामने रखी है, यद्यपि सभी लोगों ने, जिसने पी डी एस को थोड़ा भी नजदीक से देखा है यही निष्कर्ष पाया है कमेटी ने पी डी एस को सबसे अधिक भ्रष्ट प्रणाली की संस्था के रूप में पाया है |
  • कमेटी ने पाया है कि पी डी एस खाद्यानों के बड़े पैमाने पर कालाबाजारी हो रही है पी डी एस खानदान गरीबों तक नहीं पहुंचते हैं जो बहुत अधिक इनकी आवश्यकता में होते हैं |
  • यह गरीब न तो उचित मात्रा में और नहीं उचित गुणवत्ता के खाद्यानों पी डी एस से पाते हैं कभी-कभी तो यह इतने खराब किस्म के होते हैं कि वह खाने योग्य ही नहीं होते है|

कृषि मूल्य नीति

कृषि मूल्य नीति (Agricultural value policy)

  • भारत में सर्वप्रथम 1955 में कृषि लागत आयोग का गठन किया गया था| इसके अध्यक्ष प्रोफेसर दंतेवाड़ा को बनाया गया था |
  • इस आयोग की स्थापना का मुख्य उद्देश्य किसानों को अधिक उत्पादन के लिए प्रेरित करने हेतु उन्हें उपज का न्यूनतम समर्थन मूल्य प्रदान करना था |
  • 1985 में इसका नाम बदलकर कृषि लागत एवं कीमत आयोग(CACP) कर दिया गया भारत में कृषि मूल्य नीति का उद्देश्य उत्पादक एवं उपभोक्ता दोनों वर्गों को सुरक्षा प्रदान करना है |
  • उत्पादक के स्तर पर अधिक उत्पादन होने पर उन्हें कीमत घटाने की स्थिति में सुरक्षा प्रदान करना तथा उपभोक्ता के स्तर पर उन्हें उचित मूल्य पर खाद्यान्न उपलब्ध कराना है |
  • कुल मिलाकर CACP का उद्देश्य है कि कृषि उत्पादों की कीमत को स्थिर करना जिससे पूरी अर्थव्यवस्था में कीमत को स्थिर किया जा सके |

न्यूनतम समर्थन मूल्य (Minimum Support Price)

  • सरकार द्वारा प्रतिवर्ष 24 कृषि उत्पादों के लिए ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ की घोषणा की जाती है, उसका उद्देश्य होता है कि किसी वस्तु के अधिक उत्पादन की स्थिति में उसकी कीमत को एक सीमा के नीचे आने पर उत्पादकों को सुरक्षा प्रदान करना |
  • किसान अपने उत्पादों को बाजार में सही कीमत और बेचने के लिए स्वतंत्र होता है सरकार किसानों को इस बात की गारंटी देती है कि यदि बाजार के मूल्य में कमी आई तो वह न्यूनतम समर्थन मूल्य पर उसके उत्पाद को खरीद लेंगी|
  • जिससे किसानों को अधिक उत्पादन के लिए प्रेरणा मिलती है सरकार प्रत्येक फसल की बुवाई से पहले ऐसी घोषणा करती है, इसकी घोषणा सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बैठक के बाद की जाती है |

खरीद मूल्य (Purchase price)

  • सरकार द्वारा इसकी घोषणा रवि तथा खरीफ फसल की कटाई के समय की जाती है| यह न्यूनतम समर्थन मूल्य के बराबर या उससे अधिक होता है किंतु किसी भी स्थिति में यह न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम नहीं हो सकता है |

आर्थिक मूल्य (Economic value)

  • सरकार द्वारा बफर स्टॉक के लिए अनाजों की खरीद की जाती है, इसके साथ ही इनके परिवहन भंडारण तथा अन्य प्रबंधकीय कार्य में भी खर्च करना पड़ता है इन सभी खर्चों को जोड़कर अनाज का जो मूल्य होता है उसे ही आर्थिक मूल्य कहा जाता है |

जारी मूल्य (Current price)

  • अलग-अलग योजनाओं के लिए सरकार जिस मूल्य पर अनाज जारी करती है उसे ही जारी मूल्य कहा जाता है |
  • सरकार द्वारा कल्याणकारी योजनाओं के लिए जारी किए जाने वाले अनाजों का ‘जारी मूल्य’ आर्थिक मूल्य से कम होता है|आर्थिक मूल्य एवं जारी मूल्य के बीच के अंतर को ‘खाद्यान्न सब्सिडी’कहा जाता है|

मूल्य निर्धारण प्रणाली(Pricing system)


  • सरकार द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य के निर्धारण के लिए लागत प्रणाली का उपयोग किया जाता है| इसके अंतर्गत दो प्रकार की लागत का निर्धारण किया गया है C-2लागत तथा C-3 लागत |
  • C-2 लागत पर किसानों द्वारा कृषि कार्य में किया गया व्यय, श्रम तथा विद्यालयों को जोड़ा जाता है यदि जमीन पट्टे पर ली जाती है तो इसमें जमीन का किराया भी जोड़ा जाता है |
  • C-3 लागत में C-2 लागत के साथ-साथ प्रबंधकीय पारिश्रमिक के रूप में C-2 लागत का 10% जोड़ दिया जाता है |
  • C-1 लागत = फसल उत्पादन में किसानों का कुल व्यय +किसानों के द्वारा प्रयुक्त घरेलू संसाधनों का मूल्य
  • C-2 लागत = C-1 लागत+ 10% लाभ
  • C-3 लागत = C-2 लागत + किसानों के को प्रबंधकीय पारिश्रमिक का हिसाब लगाने के लिए C-2 लागत का 10%

भारतीय कृषि एवं उसकी प्रकृति

भारतीय कृषि एवं उसकी प्रकृति (Indian agriculture and its nature)

  • वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की जनसंख्या बढ़कर एक अरब 21 करोड़ से अधिक हो गई है इस बढ़ती हुई जनसंख्या की खाद्यान्न आवश्यकता की पूर्ति के संदर्भ में भारतीय कृषि का महत्व स्वभाविक रुप से बढ़ जाता है देश की कुल राष्ट्रीय आय में कृषि की भागीदारी लगभग 14.5 प्रतिशत है |
  • यद्यपि यह सेवा क्षेत्र औद्योगिक क्षेत्र की तुलना में काफी कम है किंतु भारतीय कृषि के महत्व को सिर्फ जीडीपी में भागीदारी के आधार पर नहीं आंका जाना चाहिए| भारतीय आर्थिक विकास के बावजूद देश की कुल श्रमशक्ति का लगभग 52 प्रतिशत भाग अभी भी रोजगार के लिए कृषि पर निर्भर है |
  • यही नहीं देश के औद्योगिक विकास में भी कृषि का बहुत बड़ा महत्व है सूती वस्त्र उद्योग, जूट उद्योग, चीनी उद्योग, चाय-कॉफी, खाद्य तेल आदि उद्योगों के कच्चे माल की आपूर्ति कृषि क्षेत्र से ही होती है, देश के कुल निर्यात में भी कृषि की भागीदारी 10% से अधिक है |
  • चाय, तंबाकू, गरम मसाले इत्यादि कई कृषि उत्पादों का भारत प्रमुख निर्यातक है यह प्रत्यक्ष रुप से देश में बैंकिंग क्षेत्र तथा कई उद्योगों के विकास में भी सहायक है | कृषि क्षेत्र के उपरोक्त महत्व के कारण ही भारतीय कृषि को भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी कहा जाता है |

भारतीय कृषि की प्रकृति (Nature of Indian Agriculture)

  • भारत में हरित क्रांति की सफलता के बावजूद अब भी भारतीय कृषि कई समस्याओं से ग्रसित है| यहां भूमि अधिकार के संबंध में अब भी अर्ध्द सामंती व्यवस्था पाई जाती है| काश्तकारों को अभी भूमि संबंधी अधिकार पूर्ण रूप से प्राप्त नहीं हुए हैं |
  • कृषि साख से जुड़ी हुई कई समस्याएं हैं; जैसे-छोटे एवं सीमांत किसान कृषि साख के लिए परंपरागत रुप से स्थानीय साहूकारों एवं महाजनों पर निर्भर हैं |
  • कृषि क्षेत्र में श्रम की स्थिति भी अच्छी नहीं है, अधिकांश कृषि श्रमिकों की आय काफी कम है यदि हरित-क्रांति के क्षेत्रों को छोड़ दिया जाए तो अब भी कई भागों में परंपरागत कृषि पद्धति को अपनाया जा रहा है |
  • भारतीय कृषि बाढ़, सूखा जैसी प्राकृतिक समस्याओं से भी ग्रसित है आज भी भारतीय कृषि उत्पादन का स्तर बहुत हद तक मानसून तय करता है यही कारण है कि भारतीय कृषि को मानसून का जुआ कहा जाता है |

कृषि के निर्धारण तत्व (Fixing elements of agriculture)

  • किसी भी देश में कृषि कार्य कई कारकों द्वारा निर्धारित होता है इन्हें हम प्राकृतिक, सामाजिक, ऐतिहासिक, आर्थिक एवं प्रशासनिक कार्यों के अंतर्गत शामिल कर सकते हैं |
  • किसी क्षेत्र की प्राकृतिक विशेषता फसल प्रारूप के निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है; जैसे-अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में धान, जूट जैसी फसलों की खेती होती है, वहीं अपेक्षाकृत उसके एवं अर्ध शुष्क क्षेत्रों में ज्वार, बाजरा जैसे मोटे अनाजों की खेती होती है |
  • इनके अलावा मिट्टी के प्रकार, तापमान, आर्द्रता इत्यादि का प्रभाव भी फसल प्रारूप पर पड़ता है भू-धारण प्रणाली जैसे ऐतिहासिक कारकों का प्रभाव भी कृषि के निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है |
  • फसलों के ढांचे को निर्धारित करने में किसानों की आय, कृषि सहायक वस्तुओं की कीमत आदि की भी भूमिका होती है इसके अलावा परंपरा रीति रिवाज इत्यादि का भी प्रभाव कृषि पर पड़ता है |

भूमि सुधार (Land reform)

  • भारत में परंपरागत भू-धारण व्यवस्था एक और जहां संवैधानिक रूप से सामाजिक न्याय के विपरीत की वहीं दूसरी ओर कृषि के विकास में भी बाधक थी |
  • भूमि सुधार के अंतर्गत बिचौलियों की समाप्ति काश्तकारी सुधार, जोतों के आकार में सुधार के लिए चकबंदी, भू-धारिता की सीमा निर्धारित करने के लिए हटबंदी जैसे-उपाय किए गए |
  • परंपरागत रूप से बिट्रिश काल से चली आ रही जमीनदारी, महालवाड़ी एवं रैयतवाड़ी प्रथा को समाप्त कर दिया गया |
  • जमींदारी उन्मूलन की शुरुआत 1950 में उत्तर प्रदेश से हुई तथा 1970 तक देश के सभी राज्यों में जमींदारी प्रथा समाप्त कर दी गई |

सिंचाई परियोजनाओं का वर्गीकरण (Classification of Irrigation Projects)

योजना आयोग द्वारा

  1. लघु सिंचाई परियोजना -2000 हेक्टेयर से कम
  2. मध्य सिंचाई परियोजना – 2000-10000 हजार हेक्टेयर
  3. बड़ी सिंचाई परियोजना – 10000 हेक्टेयर से अधिक

भारत में कृषि जोत का आकार


  1. सीमांत जोत – एक हेक्टेयर से कम
  2. लघु जोत – 1.2 हेक्टेयर
  3. मध्यम – 4-10 हेक्टेयर
  4. बड़ी जोत – 10 हेक्टेयर से अधिक

Various types of cultivation names

विभिन्न प्रकार की खेतियां के नाम (Various types of cultivation names)

1एरोपोनिक (Aeroponic)पौधों को हवा में उगाना
2हॉर्टिकल्चर (Horticulture)बागवानी
3ओलेरीकल्चर (Olericulture)सब्जी विज्ञान
4विटीकल्चर (Viticulture)अंगूर की खेती
5पिसीकल्चर (Pisciculture)मत्स्यपालन
6मोरीकल्चर (Moriculture)रेशम कीट हेतु शहतूत उगाना
7एपीकल्चर (Apiculture)मधुमक्खी पालन
8फ्लोरीकल्चर (Floriculture)फूल विज्ञान
9पोमोलॉजी (Pomology)फल विज्ञान
10वर्मीकल्चर (Vermiculture)केंचुआ पालन
11सेरीकल्चर (Sericulture)रेशम उद्योग

अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक

अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक (Sector of economy)

  • सामान्यतः संपूर्ण अर्थव्यवस्था की आर्थिक गतिविधियों को लेखांकित करने के लिए तीन क्षेत्रकों में विभाजित किया गया है-

प्राथमिक क्षेत्रक (Primary sector)

  • इसके अंतर्गत अर्थव्यवस्था के प्राकृतिक क्षेत्रों का लेखांकन किया जाता है इसके अंतर्गत निम्न क्षेत्रों को सम्मिलित किया जाता है जैसे –
  1. कृषि
  2. वानिकी
  3. मत्स्यन (मछली पकड़ना)
  4. खनन (ऊर्ध्वाधर खुदाई) एवं उत्खनन (क्षैतिक खुदाई)

द्वितीयक क्षेत्रक (Secondary sector)

  • इस क्षेत्रक के अंतर्गत मुख्यतः अर्थव्यवस्था की विनिर्मित वस्तुओं के उत्पादन का लेखांकन किया जाता है –
  1. निर्माण, जहां किसी स्थाई परिसंपत्ति का निर्माण किया जाए: जैसे -भवन- |
  2. विनिर्माण जहां किसी वस्तु का उत्पादन हो: जैसे -कपड़ा ब्रेड आदि- |
  3. विद्युत गैस एवं जल आपूर्ति इत्यादि से संबंधित कार्य |

तृत्तीय या सेवा क्षेत्रक (Third or service sector)

  • यह क्षेत्र अर्थव्यवस्था के प्राथमिक और द्वितीयक क्षेत्र को अपनी उपयोगी सेवा प्रदान करता है इसके अंतर्गत
  1. परिवहन एवं संचार
  2. बैंकिंग
  3. बीमा
  4. भंडारण
  5. व्यापार
  6. सामुदायिक सेवा आदि  
  • इसके अतिरिक्त अर्थव्यवस्था को कई अन्य आधारों पर विभाजित किया जाता है इसे निम्न प्रकार से रेखांकित किया जा सकता है –

वस्तु क्षेत्रक (Item area)

  • प्राथमिक क्षेत्रक और द्वितीयक क्षेत्रक को सम्मिलित रूप में वस्तु क्षेत्र कहा जाता है, इसके अंतर्गत भौतिक वस्तुओं के उत्पादन को शामिल किया जाता है |

गैर वस्तु क्षेत्रक (Non item area)

  • किसी अर्थव्यवस्था के सेवा क्षेत्रक को गैर वस्तु क्षेत्रक भी कहा जाता है |

संगठित क्षेत्रक (Organized sector)

  • इसके अंतर्गत वे सभी इकाइयां आ जाती है, जो अपने आर्थिक कार्यकलापों का नियमित लेखांकन करती है, भारतीय अर्थव्यवस्था में लगभग 9 प्रतिशत इस क्षेत्र से है |

असंगठित क्षेत्रक (Unorganized sector)


  • इसके अंतर्गत सभी इकाइयां आ जाती है जो अपने आर्थिक कार्यकलापों का कोई लेखा जोखा नहीं रखती है; जैसे – रेहड़ी, खोमचे, सब्जी की खुदरा दुकानें, दैनिक मजदूर आदि | भारतीय अर्थव्यवस्था में इसका योगदान लगभग 91 प्रतिशत है |

कृषि क्षेत्र में अनुसंधान एवं विकास (हरित क्रांति)

कृषि क्षेत्र में अनुसंधान एवं विकास (R & D in agriculture sector) हरित क्रांति (Green revolution) अमेरिकी वैज्ञानिक डॉक्टर विलियम...